शास्त्रफाय की ओर से डॉ. रविराज अहिरराव का नमस्कार।
श्रावण मास—वर्ष का सबसे पुण्यदायक, सात्त्विक और दिव्यता से परिपूर्ण महीना। हिन्दू पंचांग में यह पाँचवाँ महीना माना गया है, लेकिन आत्मिक उन्नति की दृष्टि से इसका स्थान सर्वोपरि है। यह मास केवल एक धार्मिक परंपरा नहीं, बल्कि एक आंतरिक यात्रा का निमंत्रण है—एक अवसर, जब हम अपने जीवन में पुण्य संचय का संवर्धन कर सकते हैं।
Table of Contents
Toggleचातुर्मास की शुरुआत: आध्यात्मिक तपस्या का काल
श्रावण मास की शुरुआत से पहले ही इसका महत्व रेखांकित होता है। आषाढ़ पूर्णिमा को गुरु पूर्णिमा के रूप में मनाया जाता है—ज्ञान, श्रद्धा और मार्गदर्शन के प्रतीक अपने गुरु को समर्पित दिन। और उससे ठीक चार दिन पहले आती है देवशयनी एकादशी, जब भगवान विष्णु क्षीरसागर में योगनिद्रा में प्रवेश करते हैं। इसी दिन से चातुर्मास की शुरुआत मानी जाती है—एक ऐसा विशेष काल जो कार्तिक एकादशी तक चलता है।
यह चार माह केवल व्रत और उपवास का समय नहीं है, यह आत्म-निरीक्षण, साधना और भक्ति का विशिष्ट चरण है। प्राचीन काल में हमारे ऋषि-मुनि, जो वर्षभर तीर्थयात्राओं पर रहते थे, इस काल में एक ही स्थान पर ठहरकर तपस्या और साधना करते थे। यही कारण है कि चातुर्मास को ‘स्थिर साधना का काल’ कहा गया है—जहाँ आत्मा और शरीर दोनों का विकास संभव होता है।
श्रवण नक्षत्र से जुड़ा वैज्ञानिक और ज्योतिषीय महत्व
श्रावण मास का नामकरण भी अत्यंत अर्थपूर्ण है। इस माह की पूर्णिमा को जो नक्षत्र होता है, वह है श्रवण नक्षत्र। यह नक्षत्र सुनने, ग्रहण करने और आत्मसात करने की ऊर्जा का प्रतीक है। यही कारण है कि इस महीने को श्रवण मास कहा गया—एक ऐसा समय जब हम ईश्वर की वाणी को सुनें, शास्त्रों को आत्मसात करें और अपने भीतर ईश्वर भक्ति को स्थापित करें।
महादेव की विशेष कृपा का मास
श्रावण मास को भगवान शिव की आराधना का सर्वश्रेष्ठ समय माना गया है। स्वयं स्कंदपुराण में शिवजी ने सनत कुमारों से कहा है कि वर्ष के सभी महीनों में उन्हें श्रावण मास सबसे प्रिय है। इस महीने में जो भी भक्त सच्चे मन से भगवान शिव की पूजा-अर्चना करता है, उसे अनंत पुण्य और आशीर्वाद प्राप्त होते हैं।
वारकरी संप्रदाय और पंढरपुर यात्रा
महाराष्ट्र का प्रसिद्ध वारकरी संप्रदाय इस महीने का जीवंत उदाहरण है। देवशयनी एकादशी के दिन लाखों वारकरी भक्त पैदल यात्रा करते हुए पंढरपुर पहुँचते हैं, जहाँ वे भगवान विट्ठल के दर्शन कर चातुर्मास का आरंभ करते हैं। यह केवल एक धार्मिक उत्सव नहीं, बल्कि एक जीवंत अध्यात्मिक आंदोलन है।
चातुर्मास: वैज्ञानिक दृष्टिकोण
चातुर्मास का वैज्ञानिक पहलू भी उतना ही महत्वपूर्ण है। यह वह समय होता है जब बारिश के कारण वातावरण में बीमारियाँ फैलने की आशंका सबसे अधिक होती है। हमारे ऋषियों ने इसी समय त्योहारों का नियोजन किया ताकि स्वच्छता, सतर्कता और संयम के साथ जीवन जिया जा सके।
त्योहारों के दौरान हम अपने घर और वास्तु की सफाई करते हैं। इससे न केवल घर शुद्ध होता है, बल्कि वातावरण में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है, जिससे मन और मस्तिष्क दोनों प्रसन्न रहते हैं। साथ ही इन अवसरों पर विशेष व्यंजन बनाए जाते हैं—ऐसे आहार जो शरीर को हल्का, स्वस्थ और ऊर्जा से भरपूर रखते हैं।
त्योहारों का गूढ़ उद्देश्य
त्योहार केवल आनंद और उत्सव के लिए नहीं होते; वे जीवन के संतुलन का प्रतीक होते हैं। चातुर्मास के दौरान होने वाले उत्सवों में तीन प्रमुख उद्देश्य होते हैं:
- वास्तु की शुद्धता – जिससे मानसिक प्रसन्नता और स्वास्थ्य को बल मिलता है।
- आहार संतुलन – शरीर को उपयुक्त पोषण और ऊर्जा देने वाले व्यंजन।
- आध्यात्मिक उन्नति – मंत्र, स्तोत्र और पूजा-पाठ के माध्यम से आत्म-संवर्धन।
इन तीनों का समन्वय ही हमारे भारतीय त्योहारों की आत्मा है—जहाँ तन, मन और आत्मा एक साथ प्रफुल्लित होते हैं।
तो आइए, इस श्रावण मास और चातुर्मास के पवित्र समय का पूर्ण रूप से लाभ उठाएं। अपने जीवन में शांति, स्वास्थ्य, समृद्धि और आत्मिक जागरण का प्रकाश भरें। यही है इस मास का सच्चा संदेश।
– डॉ. रविराज अहिरराव
(Shastrafy की ओर से – आपके आध्यात्मिक जीवन का पथप्रदर्शक)

